उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghar mein rauzan nahin raha koi

घर में रौज़न नहीं रहा कोई

گھر میں روزن نہیں رہا کوئی

शायर: Fahmi Badayuni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घर में रौज़न नहीं रहा कोई
अब नहीं आएगी सदा कोई

पूछ कर देखते पता अपना
काश हम को भी जानता कोई

मैं ने मस्जिद में जाना छोड़ दिया
रोज़ मिल जाता था ख़ुदा कोई

सारे वीराने हो गए नाकाम
मुझ को तन्हा न कर सका कोई

ज़िंदा रहने के मशवरे के साथ
यार तरकीब भी बता कोई

आरज़ू थी कि एक बार मुझे
मेरी आँखों से देखता कोई

चीख़ने वाले हो गए ख़ामोश
फिर दरीचा नहीं खुला कोई

ज़ह्र इतने पिलाए लोगों ने
मुझ में ज़िंदा नहीं बचा कोई