उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gharaz kisi se na ai dost tum kabhu rakhiyo

ग़रज़ किसी से न ऐ दोस्त तुम कभू रखियो

غرض کسی سے نہ اے دوست تم کبھو رکھیو

शायर: Kaleem Aajiz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़रज़ किसी से न ऐ दोस्त तुम कभू रखियो
बस अपने हाथ यहाँ अपनी आबरू रखियो

ज़माना संग सही आइने की ख़ू रखियो
जो दिल में रखियो वही सब के रू-ब-रू रखियो

रफ़ू-गरान-ए-ख़िरद के न जाइयो नज़दीक
बला से पैरहन-ए-चाक बे-रफ़ू रखियो

चराग़ घर में मयस्सर नहीं रहे न सही
जलाए दिल में मगर शम्अ-ए-आरज़ू रखियो

न जाने कौन उसे तोड़-फोड़ कर रख दे
बहुत सँभाल के इस बज़्म में सुबू रखियो

हर एक ज़र्फ़ बराबर नहीं है ऐ बुलबुल
जो आग सीने में रक्खूँ हूँ मैं न तू रखियो

यही बचाएगी शमशीर-ए-वक़्त से 'आजिज़'
हमारी बात क़रीब-ए-रग-ए-गुलू रखियो