उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham ki tha harif-e-jaan ab harif-e-jaanan hai

ग़म कि था हरीफ़-ए-जाँ अब हरीफ़-ए-जानाँ है

غم کہ تھا حریف جاں اب حریف جاناں ہے

शायर: Raaz Muradabadi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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ग़म कि था हरीफ़-ए-जाँ अब हरीफ़-ए-जानाँ है
अब वो ज़ुल्फ़ बरहम है अब वो चश्म गिर्यां है

वुसअ'तों में दामन की इन दिनों गरेबाँ है
हम-नफ़स कहीं शायद मौसम-ए-बहाराँ है

रंग-ओ-बू के पर्दे में कौन ये ख़िरामाँ है
हर नफ़स मोअ'त्तर है हर नज़र गुलिस्ताँ है

दैर क्या हरम क्या है बंदगी ये क्या जाने
हम जहाँ पे हैं वाइ'ज़ कुफ़्र है न ईमाँ है

शुक्रिया मगर नासेह तू ये 'राज़' क्या जाने
जौर बरमला उन का इल्तिफ़ात पिन्हाँ है