उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham-e-gunah se fikr-e-najat se uljhe

ग़म-ए-गुनाह से फ़िक्र-नजात से उलझे

غم گناہ سے فکر نجات سے الجھے

शायर: Qadir Siddiqi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़म-ए-गुनाह से फ़िक्र-नजात से उलझे
तमाम उम्र हम अफ़्सून-ए-ज़ात से उलझे

तवहहुमात से इक जंग थी जो जारी रही
सहाब-ए-मर्ग न अब्र-ए-हयात से उलझे

नफ़स नफ़स पे निगाहें तिरी बदलती रहीं
क़दम क़दम पे नए हादसात से उलझे

तुझे जो मान लिया हम ने बस वो मान लिया
ज़बाँ सिफ़त पे न खोली न ज़ात से उलझे

कभी ख़िरद से निपटना पड़ा कभी दिल से
तग़य्युरात से उलझे सबात से उलझे

बहुत सताया गुज़िश्ता दिनों की यादों ने
यही नहीं कि नए वाक़िआ'त से उलझे

तज़ाद लाख रहा फिर भी ज़िंदगी के लिए
ग़म-ए-अना से ग़म-ए-काएनात से उलझे

हम इस ज़माने में किस को सुनाएँ कौन सुने
दिल-ओ-निगाह की जिन वारदात से उलझे

बिसात-ए-ज़ीस्त सजाई तिरी ख़ुशी के लिए
न जीत से कभी उलझे न मात से उलझे

हमीं ने तेरी निगाह-ए-ग़ज़ब को झेला है
हमीं तिरी निगह-ए-इल्तिफ़ात से उलझे