उर्दू शायरी · ग़ज़ल

fasl-e-gul se zar-e-KHizan tak hai

फ़स्ल-ए-गुल से ज़र-ए-ख़िज़ाँ तक है

فصل گل سے زر خزاں تک ہے

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़स्ल-ए-गुल से ज़र-ए-ख़िज़ाँ तक है
'उम्र दोनों के दरमियाँ तक है

फ़ासले हैं बहुत कठिन इस के
रहगुज़र दिल से जो ज़बाँ तक है

एक दिन ख़ाल-ओ-ख़द उभारेगी
जो हक़ीक़त मिरे गुमाँ तक है

वक़्त कर देगा आइना ख़ुद ही
कौन सा हम-सफ़र कहाँ तक है

ख़ुश-गुमानी है जो मिरे अंदर
वो भी शायद तिरे बयाँ तक है

काश होती दिलों के बीच 'मुनीर'
ये रसाई जो आसमाँ तक है