उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek suraj tha ki taron ke gharane se uTha

एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा

ایک سورج تھا کہ تاروں کے گھرانے سے اٹھا

शायर: Parveen Shakir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा
आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा

किस से पूछूँ तिरे आक़ा का पता ऐ रहवार
ये अलम वो है न अब तक किसी शाने से उठा

हल्क़ा-ए-ख़्वाब को ही गिर्द-ए-गुलू कस डाला
दस्त-ए-क़ातिल का भी एहसाँ न दिवाने से उठा

फिर कोई अक्स शुआ'ओं से न बनने पाया
कैसा महताब मिरे आइना-ख़ाने से उठा

क्या लिखा था सर-ए-महज़र जिसे पहचानते ही
पास बैठा हुआ हर दोस्त बहाने से उठा