उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek suKHan ko bhul kar ek kalam tha zarur

एक सुख़न को भूल कर एक कलाम था ज़रूर

ایک سخن کو بھول کر ایک کلام تھا ضرور

शायर: Nadeem Bhabha6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक सुख़न को भूल कर एक कलाम था ज़रूर
मेरा तो ज़िक्र ही न था पर तिरा नाम था ज़रूर

काँप रहे थे मेरे हाथ चीख़ रहे थे बाम-ओ-दर
ज़हर अगर नहीं था वो आख़िरी जाम था ज़रूर

यूँही नहीं तमाम उम्र सज्दे में ही गुज़र गई
इश्क़ की इस नमाज़ का कोई इमाम था ज़रूर

याद अभी नहीं हमें ज़ेहन पे ज़ोर दे चुके
तुम ही से मिलने आए थे तुम से ही काम था ज़रूर

तुम ने जब उस की बात की तुम पे भी प्यार आ गया
चूमा नहीं तुम्हें मियाँ गरचे मक़ाम था ज़रूर

आप मुझे भुला चुके याद तो कीजिए जनाब
मेरी भी इक शनाख़्त थी मेरा भी नाम था ज़रूर