उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek aise makan mein Thahre hain

एक ऐसे मकाँ में ठहरे हैं

ایک ایسے مکاں میں ٹھہرے ہیں

शायर: Rafat Shameem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक ऐसे मकाँ में ठहरे हैं
जिस के बाहर अना के पहरे हैं

शाम पंछी कहाँ गुज़ारेंगे
शाख़-ए-गुल पर जले बसेरे हैं

हम तो मलबा हैं ना-शनासी का
टूटे-फूटे से चंद चेहरे हैं

आज बाँटी है धूप सूरज ने
अपने दामन में क्यूँ अँधेरे हैं

जाल टूटे मिले हैं साहिल पर
कौन जाने कहाँ मछेरे हैं