उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankh har shab ko andheron ki qaba dhoti hai

आँख हर शब को अँधेरों की क़बा धोती है

آنکھ ہر شب کو اندھیروں کی قبا دھوتی ہے

शायर: Rafat Shameem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँख हर शब को अँधेरों की क़बा धोती है
ख़्वाब की रेत में सूरज का शजर बोती है

एक गुमनामी का जंगल हूँ जहाँ शक्ल मिरी
अपनी पहचान का हर नक़्श-ए-यक़ीं खोती है

दूर अन-देखी सी सरहद है कि जिस के उस पार
कोई बस्ती है जो रातों को सदा रोती है

सत्ह-ए-चादर पे शिकन और सर-ए-बालीं पे नशेब
ये तो तन्हाई है बिस्तर पे मिरे सोती है

भूली-बिसरी हुई यादों की अजब भीड़ है जो
दिल के दरवाज़े पे हर शाम लगी होती है