उर्दू शायरी · ग़ज़ल

din ko bhi itna andhera hai mere kamre mein

दिन को भी इतना अंधेरा है मिरे कमरे में

دن کو بھی اتنا اندھیرا ہے مرے کمرے میں

शायर: Zafar Gorakhpuri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिन को भी इतना अंधेरा है मिरे कमरे में
साया आते हुए डरता है मिरे कमरे में

ग़म थका-हारा मुसाफ़िर है चला जाएगा
कुछ दिनों के लिए ठहरा है मिरे कमरे में

सुब्ह तक देखना अफ़्साना बना डालेगा
तुझ को इक शख़्स ने देखा है मिरे कमरे में

दर-ब-दर दिन को भटकता है तसव्वुर मेरा
हाँ मगर रात को रहता है मिरे कमरे में

चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं 'ज़फ़र'
क्या कोई और भी कमरा है मिरे कमरे में