उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil mubtala-e-hijr rifaqat mein rah gaya

दिल मुब्तला-ए-हिज्र रिफ़ाक़त में रह गया

دل مبتلائے ہجر رفاقت میں رہ گیا

शायर: Nadeem Bhabha6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल मुब्तला-ए-हिज्र रिफ़ाक़त में रह गया
लगता है कोई फ़र्क़ मोहब्बत में रह गया

इस घर के दो मकीन थे इक पेड़ और मैं
ये हिज्र तो किसी की शरारत में रह गया

इक बार मनअ' करती हुई शाम से तो पूछ
जो भी जुदा हुआ वो हक़ीक़त में रह गया

मुमकिन था तुझ को छीन ही लेता जहान से
लेकिन मैं क्या करूँ मैं मोहब्बत में रह गया

अब तू ही मेरी ख़ाली हथेली की लाज रख
मुझ से तो कोई फ़र्क़ इबादत में रह गया

तुझ पर है कोई ज़ोम न ख़ुद पर यक़ीं 'नदीम'
कुछ दिन का हम में प्यार तो आदत में रह गया