उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekhte rah gaye sab munis-o-gham-KHwar mujhe

देखते रह गए सब मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार मुझे

دیکھتے رہ گئے سب مونس و غم خوار مجھے

शायर: Ehsan Danish Kandhlvi15 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

देखते रह गए सब मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार मुझे
एक आहंग-ए-बक़ा ले गई उस पार मुझे

शब को इक नग़्मा-ए-बे-लफ़्ज़ है दिल की आवाज़
गुम न कर दे ये मिरे साज़ की झंकार मुझे

जाने ये 'इश्क़ का फ़न है कि मुसव्विर का कमाल
उस की तस्वीर से करता है जो इज़हार मुझे

उन के कूचे में बहर-गाम ये होता है गुमाँ
जैसे पहचान रहे हों दर-ओ-दीवार मुझे

जिन नशेबों में नहीं नश्व-ओ-नुमा के जौहर
उन पे क़ुदरत ने किया ला के ज़िया-बार मुझे

शर्त तक़्दीस-ए-सफ़र है ये त'अज्जुब तो नहीं
चल पड़े ले के जो ये रेत की दीवार मुझे

तिश्नगी आती है हर क़ौस में हर ख़त में नज़र
ख़त्म सदियों में करेगा मिरा फ़नकार मुझे

देखता हूँ जो सेनिमों पे ख़िल्क़त का हुजूम
बंद होते नज़र आते हैं ये बाज़ार मुझे

जाने उस हुस्न के बाज़ार पे क्या बीत गई
मुँह दिखाते नहीं क्यूँ उस के ख़रीदार मुझे

खेत जब तेज़ हवाओं से निरत करते हैं
लगते हैं बढ़ के हसीनों से तरहदार मुझे

मेरी दुक्कान में क़िंदील जलें या न जलें
जानते हैं मिरी सन'अत के ख़रीदार मुझे

बा'ज़ गुलदस्तों के फूलों से सर-ए-बज़्म-ए-सुख़न
साफ़ आई है मिरे ख़ून की मह-कार मुझे

मुझ को तन्हा न करो रंग-ए-जहाँ है कुछ और
कल का सूरज नज़र आता है धुआँ-धार मुझे

अब तो दस्तक भी कोई दे तो शरर उड़ते हैं
जल्द पत्थर से निकाले मिरा फ़नकार मुझे

उतरा जिस रोज़ भी 'दानिश' मिरा मिट्टी का लिबास
पा सकेगी न कहीं वक़्त की रफ़्तार मुझे