उर्दू शायरी · ग़ज़ल

buland zist ka apni waqar ho na saka

बुलंद ज़ीस्त का अपनी वक़ार हो न सका

بلند زیست کا اپنی وقار ہو نہ سکا

शायर: Damodar Thakur Zaki5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बुलंद ज़ीस्त का अपनी वक़ार हो न सका
तिरी नज़र में मिरा प्यार प्यार हो न सका

ज़माना ज़िंदगी का साज़गार हो न सका
जिए ज़रूर मगर ए'तिबार हो न सका

तिरा वक़ार मुकम्मल वक़ार हो न सका
किसी से तुझ को ज़माने में प्यार हो न सका

ज़माना सारा हुआ है तुम्हारा महरम-ए-राज़
न हो सका तो मिरा ए'तिबार हो न सका

हयात गुज़री ज़माने की ग़म-गुसारी में
मगर कोई भी मिरा ग़म-गुसार हो न सका