उर्दू शायरी · ग़ज़ल

basarat kho gai hai raushni mein

बसारत खो गई है रौशनी में

بصارت کھو گئی ہے روشنی میں

शायर: Jagdish Prakash7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बसारत खो गई है रौशनी में
मज़ा आने लगा है तीरगी में

सराबों से सराबों के सफ़र तक
तड़प बढ़ती गई है तिश्नगी में

ये डेरा जोगियों का है यहीं पर
मिलेगा खो दिया जो ज़िंदगी में

मुख़ातिब तुम से हूँ मैं कुछ तो बोलो
कटेगी रात क्या बेचारगी में

दुआ के बा'द पत्थर भी मिलेंगे
यही तो लुत्फ़ है दीवानगी में

तिरी चाहत में जो कुछ पा लिया है
नहीं हासिल हुआ वो बंदगी में

नहीं पहचानता मुझ को मिरा घर
बना हूँ अजनबी आवारगी में