उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baat ki baat rahe baat ka mafhum rahe

बात की बात रहे बात का मफ़्हूम रहे

بات کی بات رہے بات کا مفہوم رہے

शायर: Jagdish Prakash5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बात की बात रहे बात का मफ़्हूम रहे
और तख़य्युल मिरा ताज़ा रहे मा'सूम रहे

हर नई सोच को मज़मून बना लूँगा मगर
मेरा किरदार मिरी ज़ात से मौसूम रहे

मेरी पहचान के सब लोग जुदा होते गए
जो बचे मेरी तरह बेबस-ओ-मज़लूम रहे

आज तक बनते रहे हैं जो हमारे ज़ामिन
उन से हम हाथ मिलाने से भी महरूम रहे

अब तो बस ख़ुद ही सुना करते हैं अपनी आवाज़
आप के क़दमों की आहट से भी महरूम रहे