उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bala se ho sham ki siyahi kahin to manzil meri milegi

बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मिरी मिलेगी

بلا سے ہو شام کی سیاہی کہیں تو منزل مری ملے گی

शायर: Qamar Jalalvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मिरी मिलेगी
उधर अँधेरे में चल पड़ूँगा जिधर मुझे रौशनी मिलेगी

हुजूम-ए-महशर में कैसा मिलना नज़र-फ़रेबी बड़ी मिलेगी
किसी से सूरत तिरी मिलेगी किसी से सूरत मिरी मिलेगी

तुम्हारी फ़ुर्क़त में तंग आ कर ये मरने वालों का फ़ैसला है
क़ज़ा से जो हम-कनार होगा उसे नई ज़िंदगी मिलेगी

क़फ़स से जब छुट के जाएँगे हम तो सब मिलेंगे ब-जुज़-नशेमन
चमन का एक एक गुल मिलेगा चमन की इक इक कली मिलेगी

तुम्हारी फ़ुर्क़त में क्या मिलेगा तुम्हारे मिलने से क्या मिलेगा
'क़मर' के होंगे हज़ार-हा ग़म रक़ीब को इक ख़ुशी मिलेगी