उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badan hai mom ki gaThri pighalna hi nahin kafi

बदन है मोम की गठरी पिघलना ही नहीं काफ़ी

بدن ہے موم کی گٹھری پگھلنا ہی نہیں کافی

शायर: Uday Divakar Pandey5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदन है मोम की गठरी पिघलना ही नहीं काफ़ी
बिना तासीर सूरत का बदलना ही नहीं काफ़ी

हज़ारों भीड़ में भी वो दिखाई दे ज़रूरी है
चराग़ों को ख़बर कर दो कि जलना ही नहीं काफ़ी

ज़बाँ को खींच आँखें नोच हर वहशी दरिंदे की
सर-ए-बाज़ार इन का सर कुचलना ही नहीं काफ़ी

मोहब्बत दर्द हो या हो दवा इक बार में इस को
उगलना ही नहीं काफ़ी निगलना ही नहीं काफ़ी

उठा शमशीर लड़ना इस दफ़'अ हस्ती बचाने को
'उदय' इस बार सिक्के का उछलना ही नहीं काफ़ी