उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barha bas mujhe yun lagta hai

बारहा बस मुझे यूँ लगता है

بارہا بس مجھے یوں لگتا ہے

शायर: Jai Raj Singh Jhala7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बारहा बस मुझे यूँ लगता है
है कोई जो मुझे ही तकता है

ख़्वाब रातों में ख़्वाब में आ कर
ख़्वाब की ही तरह बिखरता है

रौशनाई निगल गया था जो
साया वो आँखों में खटकता है

दिन के सन्नाटे में क़रीब आ कर
रम्ज़ पेशानी पर टहलता है

ऐ ज़मीं प्यासी ही रहेगी तू
आसमाँ से धुआँ बरसता है

कोई बू ख़ाक कर गई शायद
देख फूलों को जी मचलता है

ग़म-तलब कब तलक रहे कोई
अब लहू आँखों से टपकता है