उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab bhala kya dekhte ho aab mein

अब भला क्या देखते हो आब में

اب بھلا کیا دیکھتے ہو آب میں

शायर: Jai Raj Singh Jhala9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब भला क्या देखते हो आब में
ग़र्क़ सब कुछ हो गया गिर्दाब में

लुत्फ़ मेरी मौत का बढ़ जाए सो
ज़हर और डाला गया ज़हराब में

हो गई तब नूर से नफ़रत मुझे
दाग़ देखे जब दिल-ए-महताब में

मैं समझता था जिन्हें शीरीं-दहन
सर-ब-सर भीगे मिले तेज़ाब में

गूँजे ही कैसे भला साज़-ए-जिगर
ज़ंग ही जब लग गया मिज़राब में

देखने के बाद सारे क़ाएदे
ऐब फिर देखे गए एराब में

ज़ेहन में कोई ख़याल आता नहीं
है रवानी ही नहीं आ'साब में

इक ख़ुदा से ही तवक़्क़ो थी फ़क़त
नोक निकल आए मगर मेहराब में

ख़ासियत है इन अदब वालों में इक
मार देते है अदब आदाब में