उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baqi sab ko harana paDta hai

बाक़ी सब को हराना पड़ता है

باقی سب کو ہرانا پڑتا ہے

शायर: Fahmi Badayuni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाक़ी सब को हराना पड़ता है
उस को तन्हा जिताना पड़ता है

चादरें ये कहाँ समझती हैं
हम को क़द भी बढ़ाना पड़ता है

जो भी चाहे ख़रीद ले हम को
बस गले से लगाना पड़ता है

'इश्क़ में घर बनाने से पहले
घर का मलबा बनाना पड़ता है

प्यास आसानी से नहीं बनती
पहले दरिया बनाना पड़ता है

उस की हैरानी के बग़ैर हमें
क़िस्सा आगे बढ़ाना पड़ता है

रोज़ बाहर की छटपटाहट को
अपने अन्दर खपाना पड़ता है