उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baqi jo log hain kahin hote

बाक़ी जो लोग हैं कहीं होते

باقی جو لوگ ہیں کہیں ہوتے

शायर: Fahmi Badayuni9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाक़ी जो लोग हैं कहीं होते
शह्र में बस तुम्हीं मकीं होते

रास्ते सब अगर हसीं होते
फ़ासले पैदा ही नहीं होते

हाए वो आसमान भी क्या था
मैं ने देखा जिसे ज़मीं होते

तू ही तू है तिरी कहानी में
काश हम भी कहीं कहीं होते

ये सुतून आँधियों में क्यों गिरते
गर ज़रा और तह-ए-ज़मीं होते

बस में होती जो गर्दिश-ए-दौराँ
तुम जहाँ होते हम वहीं होते

प्यार क्या सिर्फ़ जी-हुज़ूरी है
आप नाराज़ क्यों नहीं होते

फूल इतरा रहे हैं ख़ुश्बू पर
काश तुम भी यहीं कहीं होते

ये भी सच है कि रू-ब-रू तेरे
हम जो होते हैं वो नहीं होते