उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bagh-e-alam mein rahe shadi-o-matam ki tarah

बाग़-ए-आलम में रहे शादी-ओ-मातम की तरह

باغ عالم میں رہے شادی و ماتم کی طرح

शायर: Qamar Jalalvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाग़-ए-आलम में रहे शादी-ओ-मातम की तरह
फूल की तरह हँसे रो दिए शबनम की तरह

शिकवा करते हो ख़ुशी तुम से मनाई न गई
हम से ग़म भी तो मनाया न गया ग़म की तरह

रोज़ महफ़िल से उठाते हो तो दिल दुखता है
अब निकलवाओ तो फिर हज़रत-ए-आदम की तरह

लाख हम रिंद सही हज़रत-ए-वा'इज़ लेकिन
आज तक हम ने न पी क़िब्ला-ए-आलम की तरह

तेरे अंदाज़-ए-जराहत के निसार ऐ क़ातिल
ख़ून ज़ख़्मों पे नज़र आता है मरहम की तरह

ख़ौफ़ दिल से न गया सुब्ह के होने का 'क़मर'
वस्ल की रात गुज़ारी है शब-ए-ग़म की तरह