उर्दू शायरी · ग़ज़ल

arsa-e-hashr mein kuchh gul na khila de koi

'अर्सा-ए-हश्र में कुछ गुल न खिला दे कोई

عرصۂ حشر میں کچھ گل نہ کھلا دے کوئی

शायर: Saail Dehlvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अर्सा-ए-हश्र में कुछ गुल न खिला दे कोई
दावर-ए-हश्र पे तोहमत न लगा दे कोई

बे-कसी पूछ न बीमारों की अपने ज़ालिम
इन को तस्कीन कोई दे न दवा दे कोई

मय-गुसारो मिरी तौबा का भरोसा क्या है
अभी पी जाऊँ अगर ज़िद से पिला दे कोई

मैं अगर शौक़ से मय पीता तो बे-शक था गुनाह
मेरा क्या बस है अगर मुँह से लगा दे कोई

मह-जबीनों की गली में है ये 'साइल' की सदा
एक दो बोसा-ए-लब बहर-ए-ख़ुदा दे कोई