उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajab ishq ke ye fasane lage hain

'अजब 'इश्क़ के ये फ़साने लगे हैं

عجب عشق کے یہ فسانے لگے ہیں

शायर: Ibraheem Aatish8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अजब 'इश्क़ के ये फ़साने लगे हैं
समझते समझते ज़माने लगे हैं

जो करते हैं तौसीफ़ बे-जा किसी की
वो इंसाफ़ का ख़ूँ बहाने लगे हैं

बयाँ कर गए जो नई बात कह कर
वो क़िस्से बहुत ही पुराने लगे हैं

किसी ग़ैर का तज़्किरा ये नहीं है
हमें आज अपने सताने लगे हैं

सुनाए गए हैं जो दानिशवरों को
त'अस्सुब से पुर वो फ़साने लगे हैं

नहीं वो भी महफ़ूज़ उस के सितम से
जो बारूद रह में बिछाने लगे हैं

न ज़ाहिर हो चेहरे से ग़म इस लिए हम
उन्हें अपने दिल में दबाने लगे हैं

जहाँ रोज़ तूफ़ान उठता है 'आतिश'
वहीं रेत का घर बनाने लगे हैं