उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaqil hai ba-shuur hai kafi zahin bhi

आक़िल है बा-शुऊर है काफ़ी ज़हीन भी

عاقل ہے با شعور ہے کافی ذہین بھی

शायर: Qamar Aasi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आक़िल है बा-शुऊर है काफ़ी ज़हीन भी
इस पर है मुस्ताज़ाद वो अज़-हद हसीन भी

बोसा किसी भी फूल का हम ने नहीं लिया
रुख़्सार मुंतज़िर रहे लब भी जबीन भी

घर ले लिया है ऐन तिरे घर के सामने
और इक ख़रीद लाया हूँ मैं दूरबीन भी

सब काम हो रहे हैं अजीब इस क़दर अजीब
लिखने से पहले सोचते हैं कातबीन भी

इक शोख़-ओ-शंग तिफ़्ल छुपा है दरून-ए-दिल
संजीदा लग रहा हूँ ब-ज़ाहिर मतीन भी

आँखों में जिस की रहम हो हाथों में रोटियाँ
वो शख़्स मुफ़लिसों का धरम भी है दीन भी

इंसानियत के जिस्म पे चंद ऐसे दाग़ हैं
जिन पर है शर्मसार फ़लक और ज़मीन भी

हँसते हुए मरेगा कोई दिल गज़ीदा शख़्स
आएगा इस ड्रामे के अंदर वो सीन भी

अशआर गर सफ़र न करें दिल से दिल तलक
देते नहीं हैं दाद 'क़मर' सामईन भी