उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aae the pardes mein do chaar barson ke liye

आए थे परदेस में दो चार बरसों के लिए

آئے تھے پردیس میں دو چار برسوں کے لئے

शायर: Zafar Awan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आए थे परदेस में दो चार बरसों के लिए
रो रहे हैं बैठ कर आइंदा नस्लों के लिए

ग़ैर-मुल्की हैं यहाँ पर हम-वतन मैं अजनबी
बेच दी पहचान अपनी हम ने पैसों के लिए

कर दिया मज़दूरियों ने बूढ़ा हम को इस तरह
बिन परों के जैसे पंछी हों उड़ानों के लिए

कुछ पे कचरा घर बने हैं कुछ पे क़ब्ज़ा हो गया
छोड़ आए थे ज़मीं जो हम मकानों के लिए

हम ग़रीबान-ए-वतन की क़त्ल गाहें बन गईं
बस्तियाँ मशहूर थीं जो ख़ुश-जमालों के लिए

करते हैं हम ज़िक्र रब का होंट अपने भींच कर
खोलते हैं अब ज़बाँ धीमी अज़ानों के लिए

एक पुरखों का 'ज़फ़र' है दूसरा बच्चों का है
देस कोई भी नहीं है मेरे जैसों के लिए