नात लिरिक्स

Tere Jad Ki Hai Barahwin Ghaus-e-Azam | Tere Jad Ki Hai Barvi Ghous-e-Azam

तेरे जद की है बारहवीं ग़ौस-ए-आज़म

नात ख़्वान: सय्यिद कैफ़ी अली रज़वीशायर: मौलाना जमील-उर-रहमानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

तेरे जद की है बारहवीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !मिली है तुझे ग्यारहवीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

कोई उन के रुत्बे को क्या जानता हैमुहम्मद के हैं जा-नशीं ग़ौस-ए-आ'ज़म

तू है नूर-ओ-आईना-ए-मुस्तफ़ाईनहीं कोई तुझ सा हसीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

हुए औलिया ज़ी-शरफ़ गरचे लाखोंमगर सब से हैं बेहतरीं ग़ौस-ए-आ'ज़म

जहाँ औलिया करते हैं जब्हा-साईवो बग़दाद की है ज़मीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

तेरे रौज़ा-ए-पाक के देखने कोतड़पता है क़ल्ब-ए-हज़ीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

मुझे भी बुला लो, ख़ुदा-रा ! कि मैं भीघिसूँ आस्ताँ पर जबीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

हमें भी बुला लो, ख़ुदा-रा ! कि हम भीघिसें आस्ताँ पर जबीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

मेरे क़ल्ब का हाल क्या पूछते होये दिल है मकाँ और मकीं ग़ौस-ए-आ'ज़म

जो अहल-ए-नज़र हैं, वही जानते हैंकि हर दम हैं सब से क़रीं ग़ौस-ए-आ'ज़म

हमारी भी लिल्लाह बिगड़ी बना दोग़ुलामों के तुम हो मु'ईं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

हैं घेरे हुए चार जानिब से दुश्मनख़ुदा-रा बचा मेरा दीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

छुपा ले मुझे अपने दामन के नीचेकि ग़म की घटाएँ उठीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

वो है कौन सा उन के दर का भिकारीमददगार जिस के नहीं ग़ौस-ए-आ'ज़म

हुसैन-ओ-हसन की तो आँखों का तारावो ख़ातिम हैं और तू नगीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

हुकूमत तेरी नाफ़िज़ा है कि हक़ नेतुझे दी है फ़त्ह-ए-मुबीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

तुझे सब ने जाना, तुझे सब ने मानातेरी सब में धूमें मचीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

तू वो है तेरे पाक तलवे के आगेखिंची गर्दनें झुक गईं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

न थे मुतलक़न औलिया जिस से वाक़िफ़तुझे ने'मतें वो मिलीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

तेरी ज़ात से, ऐ शरी'अत के हामी !तरीक़त की रम्ज़ें खुलीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

शरी'अत, तरीक़त के हर सिलसिले मेंहैं तेरी ही नहरें बहीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

सलासिल की सब मंज़िलों में है फैलीतेरी रौशनी बिल-यक़ीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

ग़म-ओ-रंज में नाम तेरा लिया जबतो कलियाँ दिलों की खिलीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

करम गर करो, मेरे मदफ़न में आओतो हो क़ब्र ख़ुल्द-ए-बरीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

इलाही ! तेरा कलमा-ए-पाक मुझ कोसिखाएँ दम-ए-वापसीं ग़ौस-ए-आ'ज़म

ब-सू-ए-जमील अज़-निगाह-ए-'इनायतब-बीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! ब-बीं, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

वहाँ सर झुकाते हैं सब ऊँचे ऊँचेजहाँ है तेरा नक़्श-ए-पा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

हुसैन-ओ-हसन फूल बाग़-ए-नबी केउसी बाग़ का तू है फल, ग़ौस-ए-आ'ज़म !

सरों पर जिसे लेते हैं ताज वालेतुम्हारा क़दम है वो, या ग़ौस-ए-आ'ज़म !

दो 'आलम में है कौन हामी हमारायहाँ ग़ौस-ए-आ'ज़म, वहाँ ग़ौस-ए-आ'ज़म

जमील ! आ'ला हज़रत के क़ुर्बान जाएँकि वो गुल हैं और उन में बू ग़ौस-ए-आ'ज़म

जमील ! अपने मुर्शिद के क़ुर्बान जाऊँकि वो गुल हैं और उन में बू ग़ौस-ए-आ'ज़म

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