जा ज़िंदगी मदीने से झोंके हवा के लाशायद हुज़ूर हम से ख़फ़ा हैं मना के ला
सजदों में गिड़गिड़ा के मुहम्मद के पांव परजा और जल्द रहमत-ए-हक़ को बुला के ला
शायद हुज़ूर हम से ख़फ़ा हैं मना के ला
कुछ हम भी अपना चेहरा-ए-बातिन संवार लेंबू-बक्र से कुछ आईनें इश्क़-ओ-वफ़ा के ला
शायद हुज़ूर हम से ख़फ़ा हैं मना के ला
दुनिया बहुत ही तंग मुसलमां पे हो गईफ़ारूक़ के ज़माने का नक़्शा उठा के ला
शायद हुज़ूर हम से ख़फ़ा हैं मना के ला
बातिल से दब रही है फिर उम्मत रसूल कीमंज़र ज़रा हुसैन से फिर करबला के ला
शायद हुज़ूर हम से ख़फ़ा हैं मना के ला
किस मुँह से पेश होगा मुज़फ़्फ़र हुज़ूर-ए-हक़इस को शहीद उस्वा-ए-आक़ा बना के ला
शायद हुज़ूर हम से ख़फ़ा हैं मना के ला
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