नात लिरिक्स

Sarkar-e-Do-Aalam Ke Rukh Par Anwaar Ka Aalam Kya Hoga

सरकार-ए-दो-आलम के रुख़ पर अनवार का आलम क्या होगा

नात ख़्वान: ज़ुल्फ़िक़ार अली हुसैनीशायर: बेकल उत्साहीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

सरकार-ए-दो-'आलम के रुख़ पर अनवार का 'आलम क्या होगा !जब ज़ुल्फ़ का वस्फ़ है क़ुरआँ में, रुख़्सार का 'आलम क्या होगा !

सरकार-ए-दो-'आलम के रुख़ पर अनवार का 'आलम क्या होगा !जब ज़ुल्फ़ का ज़िक्र है क़ुरआँ में, रुख़्सार का 'आलम क्या होगा !

महबूब-ए-ख़ुदा के जल्वों से ईमान की आँखें रौशन हैंबिन-देखे ही जब ये 'आलम है, दीदार का 'आलम क्या होगा !

जब उन के गदा भर देते हैं शाहान-ए-ज़माना की झोलीमोहताज का जब ये 'आलम है, मुख़्तार का 'आलम क्या होगा !

जब उन के ग़ुलामों के दर पर झुकते हैं सलातीन-ए-'आलमफिर कोई बताए आक़ा के दरबार का 'आलम क्या होगा !

है नाम में उन के इतना असर, जी उठते हैं मुर्दे भी सुन करवो हाल अगर ख़ुद ही पूछें बीमार का 'आलम क्या होगा !

जब सुन के सहाबा की बातें कुफ़्फ़ार मुसलमाँ होते थेफिर दोनों जहाँ के सरवर की गुफ़्तार का 'आलम क्या होगा !

तयबा से हवा जब आती है, बेकल को सुकूँ मिल जाता हैइस पार का जब ये 'आलम है, उस पार का 'आलम क्या होगा !

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