नात लिरिक्स

Karam Ke Badal Baras Rahe Hain Dilon Ki Kheti Hari Bhari Hai

करम के बादल बरस रहे हैं दिलों की खेती हरी-भरी है

नात ख़्वान: ज़ुल्फ़िक़ार अली हुसैनीशायर: अब्दुल सत्तार नियाज़ीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

करम के बादल बरस रहे हैं, दिलों की खेती हरी-भरी हैये कौन आया कि ज़िक्र जिस का नगर-नगर है गली-गली है

ये कौन बन कर क़रार आया, ये कौन जान-ए-बहार आया !गुलों के चेहरे हैं निखरे-निखरे, कली-कली में शगुफ़्तगी है

दिए दिलों के जलाए रखना, नबी की महफ़िल सजाए रखनाजो राहत-ए-दिल सुकून-ए-जाँ है, वो ज़िक्र ज़िक्र-ए-मुहम्मदी है

नबी को अपना ख़ुदा न मानो, मगर ख़ुदा से जुदा न जानोहै अहल-ए-ईमाँ का ये 'अक़ीदा, ख़ुदा ख़ुदा है, नबी नबी है

मैं अपनी क़िस्मत पे क्यूँ न झूमूँ, मैं क्यूँ न वलियों के दर को चूमूँमैं नाम-लेवा हूँ मुस्तफ़ा का, ख़ुदा के बंदों से दोस्ती है

है दोश पर जिन के कमली काली, वही तो हैं दो जहाँ के वालीकोई सवाली न भेजा ख़ाली, ये बात मेरे करीम की है

नबी का हर-जा ज़ुहूर कहिए, हाँ कहिए कहिए ज़रूर कहिएउन्हें मिनल्लाहि-नूर कहिए, ये चार-सू जिन की रौशनी है

न माँगो दुनिया के तुम ख़ज़ीने, चलो नियाज़ी ! चलें मदीनेकि बादशाही से बढ़ के प्यारे नबी के दर की गदागरी है

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