नात लिरिक्स

Hum Madine Se Allah Kyun Aa Gaye

हम मदीने से अल्लाह क्यूँ आ गए

नात ख़्वान: ज़ुल्फ़िक़ार अली हुसैनीशायर: बहज़ाद लख़नवीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

हम मदीने से अल्लाह क्यूँ आ गएक़ल्ब-ए-हैराँ की तस्कीं वहीं रह गईदिल वहीं रह गया, जाँ वहीं रह गईख़म उसी दर पे अपनी जबीं रह गई

याद आते हैं हम को वो शाम-ओ-सहरवो सुकून-ए-दिल-ओ-जान-ओ-रूह-ओ-नज़रये उन्ही का करम है, उन्ही की 'अताएक कैफ़ियत-ए-दिल-नशीं रह गई

अल्लाह अल्लाह ! वहाँ का सुजूद-ओ-क़यामअल्लाह अल्लाह ! वहाँ का दुरूद-ओ-सलामअल्लाह अल्लाह ! वहाँ का वो कैफ़-ए-दवामवो सलात-ए-सुकूँ आफ़रीं रह गई

जिस जगह सज्दा-रेज़ी की लज़्ज़त मिलीजिस जगह हर क़दम उन की रहमत मिलीजिस जगह नूर रहता है शाम-ओ-सहरवो फ़लक रह गया, वो ज़मीं रह गई

पढ़ के नस्रु-म्मिनल्लाहि-फ़त्हुन-क़रीबजब हुए हम रवाँ सू-ए-कू-ए-हबीबबरकतें, रहमतें साथ चलने लगींबेबसी ज़िंदगी की यहीं रह गई

ज़िंदगानी वहीं, काश ! होती बसरकाश, बहज़ाद ! आते न हम लौट करऔर पूरी हुई हर तमन्ना मगरये तमन्ना-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं रह गई

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