नात लिरिक्स

Na Ho Aaram Jis Bimar Ko Sare Zamane Se

न हो आराम जिस बीमार को सारे ज़माने से

नात ख़्वान: सय्यिद फ़सीहुद्दीन सोहरवर्दीशायर: मौलाना हसन रज़ा ख़ानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

न हो आराम जिस बीमार को सारे ज़माने सेउठा ले जाए थोड़ी ख़ाक उन के आस्ताने से

तुम्हारे दर के टुकड़ों से पड़ा पलता है इक 'आलमगुज़ारा सब का होता है इसी मोहताज-ख़ाने से

शब-ए-असरा के दूल्हा पर निछावर होने वाली थीनहीं तो क्या ग़रज़ थी इतनी जानों के बनाने से

कोई फ़िरदौस हो या ख़ुल्द हो हम को ग़रज़ मतलबलगाया अब तो बिस्तर आप ही के आस्ताने से

न क्यूँ उन की तरफ़ अल्लाह सौ सौ प्यार से देखेजो अपनी आँखें मलते हैं तुम्हारे आस्ताने से

तुम्हारे तो वो एहसाँ और ये ना-फ़रमानियाँ अपनीहमें तो शर्म सी आती है तुम को मुँह दिखाने से

बहारे ख़ुल्द सदक़े हो रही है रू-ए-'आशिक़ परखिली जाती हैं कलियाँ दिल की तेरे मुस्कुराने से

ज़मीं थोड़ी सी दे दे बहर-ए-मदफ़न अपने कूचे मेंलगा दे, मेरे प्यारे ! मेरी मिट्टी भी ठिकाने से

पलटता है जो ज़ाइर उस से कहता है नसीब उस काअरे ग़ाफ़िल ! क़ज़ा बेहतर है याँ से फिर के जाने से

बुला लो अपने दर पर अब तो हम ख़ाना-बदोशों कोफिरें कब तक ज़लील-ओ-ख़्वार दर दर बे-ठिकाने से

न पहुँचे उन के क़दमों तक, न कुछ हुस्न-ए-'अमल ही हैहसन ! क्या पूछते हो हम गए गुज़रे ज़माने से

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