नात लिरिक्स

Mujhe Hajj Pe Bula Maula Mujhe Kaba Dikha Maula

मुझे हज पे बुला मौला मुझे काबा दिखा मौला

नात ख़्वान: हाफ़िज़ अहमद रज़ा क़ादरीशायर: सुहैल कलीम फ़ारूक़ीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

का'बे पे पड़ी जब पहली नज़रक्या चीज़ है दुनिया भूल गयायूँ होश-ओ-ख़िरद मफ़लूज हुएदिल ज़ौक़-ए-तमाशा भूल गया

पहुँचा जो हरम की चौखट तकइक अब्र-ए-करम ने घेर लियाबाक़ी न रहा फिर होश मुझेक्या माँगा और क्या भूल गया

जिस वक़्त दु'आ को हाथ उठेयाद आ न सका जो सोचा थाइज़्हार-ए-'अक़ीदत की धुन मेंइज़्हार-ए-तमन्ना भूल गया

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !तू मालिक है मेरा, मौला ! मैं बंदा हूँ तेरा, मौला !

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !

था जिस दम हाथ में मेरे ग़िलाफ़-ए-ख़ाना-ए-का'बाथे आँसू आँख से जारी, थी लब पे ये सदा, मौला !

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !

तवाफ़-ए-का'बातुल्लाह कर के फिर दो नफ़्ल अदा कर केमक़ाम-ए-मुल्तज़म पर जा के माँगूँगा दु'आ, मौला !

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !

मक़ाम-ए-इब्राहिम आएगा तो सर को झुका कर मैंनवाफ़िल पढ़ के उस जा पर करूँगा शुक्र अदा, मौला !

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !

सफ़ा-मरवा पे जब मेरे लबों पर होंगी तकबीरेंमेरे सर पर तेरी रहमत की बरसेगी घटा, मौला !

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !

वो नौ ज़िलहज की होगी शाम जब जाऊँगा मुज़्दलिफ़ाजहाँ हाजी अदा करते हैं मग़रिब और 'इशा, मौला !

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !

ये फ़ारूक़ी का मस्लक है, 'अक़ीदत है, 'अक़ीदा हैमदीने जा के बख़्शी जाएगी हर इक ख़ता, मौला !

मुझे हज पे बुला, मौला ! मुझे का'बा दिखा, मौला !

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