मिल गया मुझ को शर्फ़े-हुज़ूरी अगरमैं कहूं क्या क्या सर पर उठा लाऊंगाआईना दिल का ले कर के जाऊंगा मैंऔर मदीने का मन्ज़र उठा लाऊंगा
करबला में ये बादल ने आ कर कहाए हुसैन ! ए शहंशाहे-सब्रो-रज़ाआप आक़ा हैं इर्शाद फ़रमाइयेबूँद क्या मैं समुन्दर उठा लाऊंगा
अपने जैसा वो कहता है सरकार कोशर्म आती नहीं नजदी ग़द्दार कोपहले चेहरा मिला लेना ऐ नजदियासामने तेरे बन्दर उठा लाऊंगा
जाने क्यूं उस नबी पर न क़ुर्बान होजिन का रेहमत में डूबा ये फरमान होहोगी जिस जिस जगह प्यासी उम्मत मेरीमैं वहीँ हौज़े-क़ौसर उठा लाऊंगा
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