मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करममैं तो बे-सहारा हूँ, दामन भी है ख़ालीनबियों के नबी ! तेरी शान है निराली
मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करम
ग़म के अँधेरों ने यूँ गेरा हुवा हैआक़ा ! दुश्वार अब जीना मेरा हुवा हैबिगड़ी बना दो मेरी, तयबा के वाली !नबियों के नबी ! तेरी शान है निराली
मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करम
जिस को बुलाया गया, वो ही अर्श-ए-बरीं हैआप के सिवा ऐसा कोई नहीं हैजिस की न बात कोई रब ने भी टालीनबियों के नबी ! तेरी शान है निराली
मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करम
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