नात लिरिक्स

Main Dar-e-Mustafa Ka Mangta Hoon | Bheek Milti Hai Aastane Se

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ | भीक मिलती है आस्ताने से

नात ख़्वान: ज़ोहैब अशरफ़ीशायर: मुहम्मद अली सजनउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

चलो अच्छा हुआ, काम आ गई दीवानगी अपनीवगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते ?

न जलती शम'अ महफ़िल में तो परवाने कहाँ जाते ?तुम्हारा दर न मिलता तो ये दीवाने कहाँ जाते ?

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ, भीक मिलती है आस्ताने सेजो गदा है दर-ए-मुहम्मद का, कुछ नहीं माँगता ज़माने से

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ, भीक मिलती है आस्ताने से

जब कोई बात ना बने तेरी, या नबी या नबी पुकारा करवो नवाज़ें तो बात बनती है, ऐसे बनती नहीं बनाने से

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ, भीक मिलती है आस्ताने से

हम तो सदक़ा नबी का खाते हैं, उन की चौखट पे सर झुकाते हैंहर जगह सर बुलंद रहता है, उन की चौखट पे सर झुकाने से

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ, भीक मिलती है आस्ताने से

आल-ए-अतहार जिस को कहते हैं, वो घराना नबी की आल का हैवो मेरे मुस्तफ़ा को प्यारा है, जिस को निस्बत है इस घराने से

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ, भीक मिलती है आस्ताने से

कितना मुझ पर करम हुज़ूर का है, जब भी तड़पा है दिल ज़ियारत कोमुझ को दर पर बुला ही लेते हैं मेरे आक़ा किसी बहाने से

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ, भीक मिलती है आस्ताने से

मैं गुनहगार हूँ, सजन ! लेकिन एक उम्मीद दिल में रखता हूँहोगी बख़्शिश हमारी महशर में, ना'तें सरकार की सुनाने से

मैं दर-ए-मुस्तफ़ा का मँगता हूँ, भीक मिलती है आस्ताने से

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