नात लिरिक्स

Kash Ik Baar Dayar-e-Shah-e-Bat.ha Dekhun

काश इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

नात ख़्वान: ताबिश रेहानशायर: ताबिश रेहानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

रौज़ा-ए-शाह-ए-उमम, गुंबद-ए-ख़ज़रा देखूँकाश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

अपनी ग़ुर्बत पे बहुत आता है रोना उस दमजब किसी शख़्स को जाते हुए तयबा देखूँ

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

उन के दर की जो ग़ुलामी का शरफ़ मिल जाएफिर पलट कर न कभी घर का मैं रस्ता देखूँ

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

किस लिए, ऐ दिल ! तुझे फ़िक्र-ए-ग़म-ओ-आलाम हैचल मदीना चल वहाँ आराम ही आराम है

जो निगाहों की है ठंडक और मेरे दिल का क़रारवो मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्ले-'अला का नाम है

ढूँडने वाला कमी प्यारे नबी की ज़ात मेंकल भी था हारा हुआ और आज भी नाकाम है

देख कर शहर-ए-नबी जन्नत की याद आने लगीकितनी प्यारी सुब्ह इस की, क्या मुनव्वर शाम है

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

मेरे मौला ! मेरी नज़रों की हिफ़ाज़त फ़रमाअब किसी तौर बुराई का न चेहरा देखूँ

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

अब तो दे दे मुझे तौफ़ीक़-ए-ज़ियारत, या रब !कब तलक चश्म-ए-तसव्वुर से मदीना देखूँ

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

अपनी नापाक निगाहों से, ऐ ताबिश ! आख़िरकैसे सरकार का पाकीज़ा मैं रौज़ा देखूँ

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

सर से ले कर पाँव तक जो मज़हर-ए-क़ुरआन हैसारे इंसानों में वो सब से अज़ीमुश्शान है

दी मु'आफ़ी वहशी-ओ-हिंदा को भी सरकार नेदेख कर लुत्फ़-ओ-करम ये हर कोई हैरान है

मेरे फ़न्न-ए-ना'त-गोई को हिक़ारत से न देखकुछ ख़बर भी है तुझे ये सुन्नत-ए-हस्सान है

शहर-ए-तयबा में गुज़ारूँ मैं भी जा के सुब्ह-ओ-शामएक मुद्दत से, ऐ ताबिश ! दिल में ये अरमान है

काश ! इक बार दयार-ए-शह-ए-बतहा देखूँ

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