नात लिरिक्स

Karbala Ki Khaak Par Kya Aadmi Sajde Mein Hai

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में है

नात ख़्वान: ज़ोहैब अशरफ़ीशायर: इफ़्तिख़ार आरिफ़उपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैमौत रुस्वा हो चुकी है, ज़िंदगी सज्दे में है

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैं

वो जो इक सज्दा 'अली का बच रहा था वक़्त-ए-फ़ज्रफ़ातिमा का लाल शायद अब उसी सज्दे में है

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैं

वो जो 'आशूरा की शब गुल हो गया था इक चराग़अब क़यामत तक उसी की रौशनी सज्दे में है

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैं

हश्र तक जिस की क़सम खाते रहेंगे अहल-ए-हक़एक नफ़्स-ए-मुतमइन उस दाइमी सज्दे में है

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैं

नोक-ए-नेज़ा पर भी होनी है तिलावत बा'द-ए-'अस्रमुसहफ़-ए-नातिक़ तह-ए-ख़ंजर अभी सज्दे में है

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैं

इस पे हैरत क्या लरज़ उट्ठी ज़मीन-ए-कर्बलाराकिब-ए-दोश-ए-पयम्बर आख़िरी सज्दे में है

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैं

सुन्नत-ए-पैग़म्बर-ए-ख़ातिम है सज्दे का ये तूलकल नबी सज्दे में थे, आज इक वली सज्दे में है

कर्बला की ख़ाक पर क्या आदमी सज्दे में हैं

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