नात लिरिक्स

Jaan-o-Dil Se Tum Pe Meri Jaan Qurban Ghaus-e-Paak

जान-ओ-दिल से तुम पे मेरी जान क़ुर्बां ग़ौस-ए-पाक

नात ख़्वान: ज़ैद नियाज़ अत्तारी · सय्यिद अब्दुल क़ादिर जीलानी मियाँशायर: मौलाना जमीलुर्रहमान क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

एकसमान पाठ की दो संग्रह प्रविष्टियाँ इसी मुख्य पेज पर मिलाई गई हैं। आयात में उपलब्ध नात ख़्वान श्रेय: ज़ैद नियाज़ अत्तारी · सय्यिद अब्दुल क़ादिर जीलानी मियाँ। यह श्रेय रिकॉर्ड में दिया गया है; प्रत्येक गायन का अलग प्रमाण यहाँ उपलब्ध नहीं है।

जान-ओ-दिल से तुम पे मेरी जान क़ुर्बां, ग़ौस-ए-पाक !है सलामत तुम से मेरा दीन-ओ-ईमाँ, ग़ौस-ए-पाक !

मैं तेरा अदना भिकारी, तू मेरा सुल्तान हैहै क़सम हक़ की ये मेरा दीन-ओ-ईमाँ, ग़ौस-ए-पाक !

मैं तेरा मम्लूक, तू मालिक, मैं बंदा, तू है शाहतू सुलैमाँ और मैं मोर-ए-सुलैमाँ, ग़ौस-ए-पाक !

सज्दा-गाह-ए-औलिया-ए-दहर है नक़्श-ए-क़दमऔर तेरी ना'ल-ए-मुक़द्दस ताज-ए-शाहाँ, ग़ौस-ए-पाक !

औलिया हैं सब सलातीं, हम रि'आया-ओ-ग़ुलामऔलिया सब हैं र'ईय्यत और सुल्ताँ ग़ौस-ए-पाक

हाथ ख़ाली, रू-सिया 'आसी ये सब कुछ हूँ मगरनाम है तेरा मेरे सीने में पिन्हाँ, ग़ौस-ए-पाक !

आप की चश्म-ए-करम का इक इशारा हो अगरदो जहाँ की मुश्किलें हो जाएँ आसाँ, ग़ौस-ए-पाक !

नाज़ क़िस्मत पे करूँ पाऊँ जहाँ की सरवरीतेरी चौखट का अगर बन जाऊँ दरबाँ, ग़ौस-ए-पाक !

कब बुलाएँ अपने दर पर, कब रुख़-ए-अनवर दिखाएँकब निकालें देखो मेरे दिल का अरमाँ, ग़ौस-ए-पाक !

मेरी आँखें तेरा गुंबद, तेरी चौखट मेरा सरमेरा लाशा और हो तेरा बयाबाँ, ग़ौस-ए-पाक !

ज़िंदगी में, नज़'अ में, मरक़द में, हश्र-ओ-नश्र मेंहर जगह हैं अपने बंदों के निगहबाँ, ग़ौस-ए-पाक !

आप का नाम-ए-मुक़द्दस मेरे दिल पर नक़्श हैमेरी बख़्शिश के लिए काफ़ी है सामाँ, ग़ौस-ए-पाक !

हम भी 'इस्याँ ले के जाएँगे बदलने के लिएहश्र में खोलेंगे जब रहमत की दुकाँ ग़ौस-ए-पाक

कोई पूछे या न पूछे बात कुछ ख़तरा नहींहश्र में हैं हम गुनहगारों के पुर्सां ग़ौस-ए-पाक

पुर्सिश-ए-आ'माल का है वक़्त, मौला ! अल-मददनाम-लेवों को छुपा लो ज़ेर-ए-दामाँ, ग़ौस-ए-पाक !

भेजा तू ने ही मु'ईनुद्दीन चिश्ती को यहाँहिन्द में तेरे सबब से हैं मुसलमाँ, ग़ौस-ए-पाक !

तेरे होते साते आए यूँ मुसलमानों में ज़ो'फ़अल-मदद, या अब्द-ए-क़ादिर शाह-ए-जीलाँ ग़ौस-ए-पाक !

काले काले कुफ़्र के बादल उमड़ कर आए हैंअल-मदद, या क़ुत्ब-ए-'आलम शाह-ए-जीलाँ ग़ौस-ए-पाक !

लुट रहा है क़ाफ़िला, बग़दाद वाले ! ले ख़बरअल-मदद, महबूब-ए-सुब्हाँ शाह-ए-जीलाँ ग़ौस-ए-पाक !

ज़ालिमों ने ज़ुल्म से बंदों को कर डाला हलाकअल-मदद, बग़दाद वाले शाह-ए-जीलाँ ग़ौस-ए-पाक !

है किधर ? आ देख तू बंदो की क्या हालत हुईऐ मेरे बग़दाद वाले शाह-ए-जीलाँ ग़ौस-ए-पाक !

लाज वाले ! सुन्नियों की लाज तेरे हाथ हैक़ादरी मंज़िल के दूल्हा, शाह-ए-जीलाँ ग़ौस-ए-पाक !

हो रज़ा पर लुत्फ़ तेरा, हम पर उन का लुत्फ़ होउन का दामाँ हम पे, उन पर तेरा दामाँ, ग़ौस-ए-पाक !

कीजिए इमदाद, 'इज़्ज़त दो जहाँ में दीजिएहै जमील-ए-क़ादरी अदना सना-ख़्वाँ, ग़ौस-ए-पाक !

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।