नात लिरिक्स

Ik Na Ik Din Ye Maddaah-e-Khairul-Bashar Naam Apna Zamaane Mein Kar Jaaega

इक न इक दिन ये मद्दाह-ए-ख़ैरुल-बशर नाम अपना ज़माने में कर जाएगा

नात ख़्वान: शोऐब रज़ा वारसीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

इक न इक दिन ये मद्दाह-ए-ख़ैरुल-बशरनाम अपना ज़माने में कर जाएगाआसमाँ पर उसे ग़ुस्ल देंगे मलकजो नबी की मोहब्बत में मर जाएगा

वो रसूलों में, नबियों में मुमताज़ हैंउन को बख़्शे ख़ुदा ने ये ए'जाज़ हैंचल दयार-ए-मदीना में तू सर के बलतेरा बिगड़ा मुक़द्दर सँवर जाएगा

कितना बरतर-ओ-बाला है पा-ए-नबीचूमते हैं अदब से जो रूहुल-अमींजिन के ना'लैन को चूमे 'अर्श-ए-बरींउन का तलवा कोई क्या समझ पाएगा

दस्त-ए-क़ुदरत से जिन की जुदा रूह हुईसय्यिदा फ़ातिमा की है 'अज़मत बड़ीजिन को देखा नहीं है फ़रिश्तों ने भीउन का पर्दा कोई क्या समझ पाएगा

इक नवासे की तिश्ना-लबी है अजबया'नी शब्बीर की बंदगी है अजबजो झुके तो क़यामत तलक न उठेऐसा सज्दा कोई क्या समझ पाएगा

देख कर नूर, राजा ये कहने लगामैं ने ख़्वाजा को पानी किया बंद थाक्या पता था कि सागर समा जाएगाउन का कासा कोई क्या समझ पाएगा

अहल-ए-सुन्नत के 'उलमा का है फ़ैसलाइस सदी के मुजद्दिद हैं अहमद रज़ाछेड़ कर देखो इन का ज़रा तज़्किराचेहरा-ए-नज्दिया ख़ुद उतर जाएगा

सब के मुर्शिद, मेरे तालिब-ओ-राहबरहैं इमाम अहल-ए-सुन्नत के लख़त-ए-जिगरदेखना होगा इक दिन ज़माना उधरमेरा ताजु-श्शरि'आ जिधर जाएगा

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