नात लिरिक्स

Hun Khak Magar Aalam-e-Anwaar Se Nisbat Hai

हूँ ख़ाक मगर आलम-ए-अनवार से निस्बत है

नात ख़्वान: उमेर मुनीर क़ादरीशायर: सय्यिद अल्ताफ़ शाह काज़मीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

हूँ ख़ाक मगर 'आलम-ए-अनवार से निस्बत हैमैं कुछ भी नहीं लेकिन सरकार से निस्बत है

दुनिया की शहंशाही रखता हूँ मैं ठोकर परकौनैन के उस मालिक-ओ-मुख़्तार से निस्बत है

मैं ख़ाक का पुतला हूँ, वो 'अर्श के राही हैंइस पार का बासी हूँ, उस पार से निस्बत है

हैं रोज़-ए-अज़ल से मेरी घुट्टी में वफ़ाएँनाज़ा हूँ कि 'अब्बास 'अलम-दार से निस्बत है

सर झुक नहीं सकते सर-ए-महशर भी हमारेसर इस लिए ऊँचे हैं, सरदार से निस्बत है

हम मानने वाले हैं हुसैन इब्न-ए-'अली केवक़्त आए अगर दीं पे तो फिर दार से निस्बत है

सरकार के दामन से, अल्ताफ़ ! हूँ वाबस्ताग़म पास भी क्यूँ आएँ कि ग़म-ख़्वार से निस्बत है

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