नात लिरिक्स

Hashr Mein Khud Ko Jo Dekhunga Bikhar Jaunga

हश्र में ख़ुद को जो देखूँगा बिखर जाऊँगा

नात ख़्वान: क़ारी शाहिद महमूद क़ादरीशायर: रफ़ीक़ ज़िया क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

हश्र में ख़ुद को जो देखूँगा बिखर जाऊँगाआप ने गर न सँभाला तो किधर जाऊँगा

इतना मानूस हूँ, आक़ा ! मैं तेरे क़दमों सेमुझ को क़दमों से किया दूर तो मर जाऊँगा

मेरा सर आप की दहलीज़ के क़ाबिल तो नहींख़ाक बन कर तेरे क़दमों में बिखर जाऊँगा

मेरी हर आस की डोरी दर-ए-पंजतन से जुड़ीबे-ख़तर हो के लहद में मैं उतर जाऊँगा

'आदत-ए-ना'त बहाना है मेरी बख़्शिश काना'त पढ़ते हुए मैं पुल से गुज़र जाऊँगा

मुझ को बस अपने ग़ुलामों में ही रखना, आक़ा !ये सनद ले के मैं दुनिया से गुज़र जाऊँगा

इस से बढ़ कर नहीं ए'ज़ाज़ कोई और, ज़िया !लोग तेरा ही कहेंगे मैं जिधर जाऊँगा

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