नात लिरिक्स

Ik Main Hi Nahin Un Par Qurban Zamana Hai | Ek Main Hi Nahi Un Par Qurban Zamana Hai

इक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है

नात ख़्वान: क़ारी शाहिद महमूद क़ादरीशायर: पीर नसीरुद्दीन नसीरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

इक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना हैजो रब्ब-ए-दो-'आलम का महबूब यगाना है

कल पुल से हमें जिस ने ख़ुद पार लगाना हैज़हरा का वो बाबा है, हसनैन का नाना है

उस हाशमी दूल्हा पर कौनैन को मैं वारूँजो हुस्न-ओ-शमाइल में यकता-ए-ज़माना है

'इज़्ज़त से न मर जाएँ क्यूँ नाम-ए-मुहम्मद परहम ने किसी दिन यूँ भी दुनिया से तो जाना है

आओ दर-ए-ज़हरा पर फैलाए हुए दामनहै नस्ल करीमों की, लजपाल घराना है

हूँ शाह-ए-मदीना की मैं पुश्त-पनाही मेंक्या इस की मुझे पर्वा दुश्मन जो ज़माना है

ये कह के दर-ए-हक़ से ली मौत में कुछ मोहलतमीलाद की आमद है, महफ़िल को सजाना है

क़ुर्बान उस आक़ा पर कल हश्र के दिन जिस नेइस उम्मत-ए-'आसी को कमली में छुपाना है

सौ बार अगर तौबा टूटी भी तो हैरत क्याबख़्शिश की रिवायत में तौबा तो बहाना है

हर वक़्त वो हैं मेरी दुनिया-ए-तसव्वुर मेंऐ शौक़ ! कहीं अब तो आना है न जाना है

पुर-नूर सी राहें हैं, गुंबद पे निगाहें हैंजल्वे भी अनोखे हैं, मंज़र भी सुहाना है

हम क्यूँ न कहें उन से रूदाद-ए-अलम अपनीजब उन का कहा ख़ुद भी अल्लाह ने माना है

महरूम-ए-करम इस को रखिए न सर-ए-महशरजैसा है नसीर आख़िर साइल तो पुराना है

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