हम ग़ुलामों का रखना ख़ुदारा ! भरमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
या शफ़ी-ए-उमम ! लिल्लाह ! कर दो करमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरमहम ग़ुलामों का रखना ख़ुदारा ! भरमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
तेरी चौखट के मँगते हैं, जाएँ कहाँ ?अपनी रहमत से भर दीजिए झोलियाँहम हैं उम्मीदवार-ए-करम, हो करमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
मुंतशिर हैं ख़यालात की वादियाँलुट गया है सुकूँ, वाली-ए-दो-जहाँ !दूर हो जाएँ ग़म, या शह-ए-मोहतरम !शाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
या नबी अपनी उल्फ़त की सौग़ात देअपनी शायान-ए-शान हम को ख़ैरात देइस से मतलब नहीं कि सिवा हो या कमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
तेरी यादों से मा'मूर सीना रहेसामने मेरे तेरा मदीना रहेदर पे बैठा रहूँ ले के मैं चश्म-ए-नमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
किस को जा कर कहें ? ताजदार-ए-हरम !घेरा डाले हुए हैं ज़माने के ग़मरहम फ़रमा दे अब, तेरी उम्मत हैं हमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
मेरे हाथों में कासा है उम्मीद काहूँ भिकारी, शहा ! मैं तेरी दीद कामैं गदा-ए-हरम, तू नबी मोहतरमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
हाज़री हो नियाज़ी की दरबार मेंज़िंदगी हो बसर तेरे अज़कार मेंआते जाते रहें तेरी चौखट पे हमशाला वसदा रवे तेरा सोहणा हरम
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