उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zulfen khul khul ke giri jati hain KHud shanon par

ज़ुल्फ़ें खुल खुल के गिरी जाती हैं ख़ुद शानों पर

زلفیں کھل کھل کے گری جاتی ہیں خود شانوں پر

शायर: Nadim Nadeem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ुल्फ़ें खुल खुल के गिरी जाती हैं ख़ुद शानों पर
आज वहशत का अलग रंग है दीवानों पर

बाद में देखते हैं झील सी आँखें तेरी
पहले तो आ के नज़र टिकती है पिस्तानों पर

कोई इल्ज़ाम तराशी की ज़रूरत न पड़ी
हम ने ख़ुद हाथ रखे अपने गरेबानों पर

तुझ को मा'लूम नहीं तेरी हिफ़ाज़त के लिए
ला'नतें कितनी पड़ीं तेरे निगहबानों पर

मैं ने जब देखा सर-ए-तूर तिरा सच नहीं है
तब तरस आया तिरी दीद के हैरानों पर

शाम के वक़्त जहाँ भर के सताए दरवेश
एक परचम के तले मिलते हैं मय-ख़ानों पर

हम ने हर रोज़ नए शहर की मिट्टी डाली
ज़िंदगी बख़्शने वाले तिरे एहसानों पर