उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baiThe hain sar-e-baam-e-falak zulf bikhere

बैठे हैं सर-ए-बाम-ए-फ़लक ज़ुल्फ़ बिखेरे

بیٹھے ہیں سر بام فلک زلف بکھیرے

शायर: Nadim Nadeem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बैठे हैं सर-ए-बाम-ए-फ़लक ज़ुल्फ़ बिखेरे
जैसे कि कहीं डाले हों बंजारों ने डेरे

इस दर्जा न बद-ज़न हो मिरी जान तू हम से
हम जो भी हैं जैसे भी हैं मेहमान हैं तेरे

क्यूँ हम से मिले कोई कि होते हैं हमेशा
सर-सब्ज़ दरख़्तों पे परिंदों के बसेरे

कुछ दिन तो फँसा कर रखा मैं ने उसे ख़ुद में
फिर साथ नहीं रह सकी तन्हाई भी मेरे

हम शहर-ए-तमन्ना से अगर कूच करें तो
आ आ के तमाशाई लगा लेते हैं घेरे