उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi ek jal mein uljhi hui hai aaj bhi

ज़िंदगी इक जाल में उलझी हुई है आज भी

زندگی اک جال میں الجھی ہوئی ہے آج بھی

शायर: Balbir Rathi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी इक जाल में उलझी हुई है आज भी
बेबसी पहले जो थी वो बेबसी है आज भी

आज भी सहमी हुई है हर तरफ़ इंसानियत
आदमी की कोशिशों में कुछ कमी है आज भी

ऐ दिल-ए-मा'सूम तेरी आरज़ूओं के तुफ़ैल
बे-सबब बे-मुद्द’आ दीवानगी है आज भी

मेरी मंज़िल के निशाँ तक मिट चुके मुद्दत हुई
किस लिए ऐ दिल वही आवारगी है आज भी

एक मुद्दत हो गई वो हादिसा गुज़रे हुए
हौसलों पर किस लिए बेचारगी है आज भी

ज़िंदगी क्यों ख़ुश्क है बे-कैफ़ है बे-रंग है
कुछ न कुछ तो बात है जिस की कमी है आज भी