उर्दू शायरी · ग़ज़ल

abhi tak talKHi-e-mai mein kami malum hoti hai

अभी तक तल्ख़ी-ए-मय में कमी मा'लूम होती है

ابھی تک تلخیٔ مے میں کمی معلوم ہوتی ہے

शायर: Balbir Rathi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अभी तक तल्ख़ी-ए-मय में कमी मा'लूम होती है
लबों पर इक बला की तिश्नगी मा'लूम होती है

तसव्वुर में तुम्हारी मुस्कुराहट रच गई शायद
मुझे हर शय मसर्रत से भरी मा'लूम होती है

सुना है ज़िंदगी में कश्मकश से लोग डरते हैं
मुझे तो कशमकश ही ज़िंदगी मा'लूम होती है

मिरी मा'सूमियत तो देख लो फ़र्त-ए-मोहब्बत में
तुम्हारी बे-रुख़ी भी दिल-लगी मा'लूम होती है

ख़ुलूस-ए-दिल से क्या जज़्बा नुमायाँ कर दिया तुम ने
कि हर सूरत मुझे कुछ अजनबी मा'लूम होती है

किसी की दोस्ती में दुश्मनी की बू तो क्या आए
मुझे तो दुश्मनी भी दोस्ती मा'लूम होती है