उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi bhi wo zindagi hi nahin

ज़िंदगी भी वो ज़िंदगी ही नहीं

زندگی بھی وہ زندگی ہی نہیں

शायर: Ushba Tabeer9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी भी वो ज़िंदगी ही नहीं
जिस का मक़्सूद आगही ही नहीं

जल रहे हैं चराग़ हर जानिब
दिल के हुजरे में रौशनी ही नहीं

ख़ुश्क सहरा मिरा वजूद सही
पर निगाहों में तिश्नगी ही नहीं

आदमिय्यत की सोच से है परे
जिस की फ़ितरत में आजिज़ी ही नहीं

ऐसा बंदा भी कोई बंदा है
जिस में मौजूद बंदगी ही नहीं

हुस्न आसूदा-ए-नज़र क्या हो
जिस की ख़सलत में सादगी ही नहीं

चाँद निकला है आज चौदहवीं का
मेरे आँगन में चाँदनी ही नहीं

गुनगुनाहट में ग़म है भंवरो की
आज फूलों में ताज़गी ही नहीं

हाए इस दौर-ए-ना-मसाएद में
मो'तबर कोई आदमी ही नहीं