उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nahin hongi kabhi phir aabdida

नहीं होंगी कभी फिर आबदीदा

نہیں ہوں گی کبھی پھر آب دیدہ

शायर: Ushba Tabeer8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नहीं होंगी कभी फिर आबदीदा
करूँगी वसवसों को सर-बुरीदा

मुख़ालिफ़ हैं पस-ए-दीवार मेरे
सर-ए-महफ़िल जो पढ़ते हैं क़सीदा

उठाऊँगी हज़ारों बोझ तन्हा
भले हालात जितने हों कशीदा

मसाइब से हुई है जाँ-ख़लासी
मगर ये दिल है क्यों इतना कबीदा

चलो अब अलविदा'अ कहते हैं तुम को
अमल ये है अगरचे जाँ-गज़ीदा

सुकूँ दूँगी मैं तेरे ज़ेहन-ओ-दिल को
सुना कर अपनी ग़ज़लें चीदा चीदा

ज़माने भर की ने'मत उस ने पाई
मिले हैं जिस को औसाफ़-ए-हमीदा

रफ़ू-गर ढूँड लाए कोई 'उश्बा'
लिए फिरते हैं हम दामन-दरीदा